Monday, March 21, 2022

विश्वकवितादिवस 2022


#विश्वकवितादिवस 2022

उजियारे में , अंधकार में || कल कहार में , बीच धार में 

घोर घृणा में , पूत प्यार में || क्षिणिक जीत में , दीर्घ हार में 

जीवन के शत शत आकर्षण || अरमानों को ढलना होगा 

कदम मिलाकर चलना होगा  !!!

Tuesday, April 14, 2015

अब दोस्त कोई लाओ मुकाबिल में हमारे ....

जनाब मुनव्वर राणा


बलंदी देर तक किस शक्स के हिस्से में रहती है.....
बहूत उंची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है !!
बहूत जी चाहता है कैदे-ए-जा से हम निकल जाएं.. 
तुम्हारी याद भी लेकिन इसी मलबे में रहती है !!
ये ऐसा कर्ज है जो मैं अदा कर भी नहीं सकता..
मैं जब तक घर ना लौटूँ मेरी माँ सजदे में रहती है !!



अब दोस्त कोई लाओ मुकाबिल में हमारे ....
दुश्मन तो कोई कद के बराबर नहीं निकला !!!




किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई.. 
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई !!! 




हम एक चेहरे में अपना नाक-ओ-नक्शा छोड़ आये हैं !!!
                                                                                   

वो लीची से लदे पेड़ों का खामोशी से उतरना ... 
मुजफ्फरपुर हम तुझको अकेला छोड़ आये हैं !!!


जो एक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है ...
वहीं हसरत के ख्वाबों को भटकता छोड़ आयें हैं !!!

यहाँ आते हर कीमती समान ले आये ...
मगर इक़बाल का लिक्खा तराना छोड़ आये हैं !!!

किसी की आरज़ू के पावों में ज़ंजीर डाली थी...
किसी की खून की तीली में फन्दा छोड़ आयें हैं !!

हमारा रास्ता तकते हुए पथरा गयी होंगी ...
वो आखें जिनको हम खिड़की पे रखा छोड़ आयें हैं !!!

गये वक़्तों की एल्बम देखने बैठे तो याद आया... 
हम एक चेहरे में अपना नाक-ओ-नक्शा छोड़ आये हैं !!!



                                                              - जनाब मुनव्वर राणा 


Note : The image of the  has been taken from wiki (Lychee_garden_in_Muzaffarpur.JPG)

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Sunday, October 13, 2013

नेताजी कहन और रावण दहन !!!

नेताजी कहन और रावण दहन !!!


हर साल 50 फीट उंचा रावण बनाते थे.. 
इस बार हमने 20 फीट उंचा रावण बानाया..
20 फीट के रावण को जलाने के लिये.. 
एक बड़े नेता जी  को आमंत्रण पत्र भिजवाया..
नेता जी ने फोन कर के हमसे पुछवाया..
क्या एक ही पुतला दहन का कार्यक़म बनवाया है ?
कुम्भकरण का रोल कहाँ पर कट करवाया है ?
हमने कहाँ महंगाई ने रावण की उचाई को काट दिया है...
इसीलिये हमने भी कुम्भकरण का रोल थोड़ा सा छांट दिया है !!

नेता जी ने आमंत्रण की हामी भिजवाई,
तय समय पर रावण को जलाने की बारी आई,
लेकिन जैसे ही रावण पर पड़ी नेता जी की परछाई... 
पुतले के अंदर सजीव रावण की आत्मा आई !!

अब रावण विपक्ष के नेता की तरह चिल्लाया...
अबे नेता के बच्चे तू मुझे क्यों जलाने आया ?
युगों से में मर्यादा पुरषोत्तम राम के हाथों जला हू ,
अब क्या कलयुग में मुझे येह अपमान भी सेहना पड़ेगा ?
तुझ जैसे निकम्मे भ्रष्ट नेता के हाथो जलना पड़ेगा !!

नेता ने पूरा साहस दिखाया, ना शर्माया ना घबराया !!
अपने अनुभव का bio data उसने रावण को बताया,

हे रावण, हम भ्रष्टाचार की गंगोत्री से पार पा चुके हैं ...
सम्मान अपमान की मोह-माया से बहुत उपर जा चुके हैं...
दंगो से लेकर कोयले घोटालो की फाइल तक जला चुके है ...
सियासत के बियाबान में सद्भावना और विश्वास को खा चुके हैं ...

इसके आगे तुझे और कुछ नहीं कहना होगा... 
और आज फिर से तुझे नेता के हाथों जलना होगा 
... आज फिर से तुझे नेता के हाथों जलना होगा  !!!

                                                                                                 स्वरचित : पं. तापस तिवारी 
                                                                                                 १३ / १०/ २०१३ 
                                                                                                 २ : ४५  

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Note : The image of ravan taken from jnilive.mobi 

Saturday, August 24, 2013

हजम करोड़ो कर गए.....

The word Octastich means Poem or Stanza of 8 lines. 

Here is one of the Octastich which i had mentioned many times during debates and extempores competition since childhood at state and national level and youth festivals for topics aligned to politics and others. And Its still relevant as of today!!  :)

हजम करोड़ो कर गए....


हजम करोड़ो कर गए , लेते नहीं डकार...
मंत्री बनकर लूटते ,  चोरो के सरदार ...
इन चोरो के सरदारों ने न बहुमत पूरा पाया ...
भ्रष्ट तरीको से संसद में अपना पैर जमाया ...
इन पारदर्शी नेताओं को न चिंता है न शर्म ...
रिश्वत इनका पेशा है और कुर्सी इनका धर्म !!




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अपराध भाव की व्यथा.....


अपराध भाव की व्यथा मिसरे बना गयी ..
अनुभूति आत्मग्लानी की गजले बना गयी ..
फुरसत तो हमे भी थी देश के लिए ...
पर पेट भर गया तो नींद आ गयी !!!!



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Note : The image taken from jnilive.mobi and p.twimg.com

Saturday, August 17, 2013

१५ अगस्त का दिन है कहता..... ~श्री अटलबिहारी वाजपेयी

Here is another thought provoking poem from Shri Atalbihari Vachpayee . No offence to any one, this poem still is too relevant.  Remembering and missing this multi talented personality.



 
१५ अगस्त का दिन है कहता, आज़ादी अभी अधूरी है.......

१५ अगस्त का दिन है कहता, आज़ादी अभी अधूरी है |
सपने सच होने बाकि है,रावि की शपथ न पूरी है ||
जिनकी लाशो पर पग रखकर आज़ादी भारत मे आई,
वो अबतक है खानाबदोश गम की काली बदली छाई |
कलकते के फूटपाथो पर जो अंधी पानी सहते है,
उनसे पूछो १५ अगस्त के बारे मे क्या कहते है,

हिंदू के नाते उनका दुःख सुनते यदि तुम्हे लज्जा आती,
तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहा कुचली जाती |
इमांन जहा बेचा जाता इंसान ख़रीदा जाता है,
इस्लाम सिसकिया भरता है डॉलर मन मे मुस्काता है |
भूखो को गोली नंगो को हथियार पहनाये जाते है,
सूखे कंठो से जेहादी नारे लगवाए जाते है |
लाहोर कराची ढाका पर मातम की है काली छाया,
पख्तूनो पर गिलगित पर है गम्सीन गुलामी का साया |
बस इसीलिए तो कहता हू आज़ादी अभी अधूरी है,
कैसे उल्लास मनाऊ मैं थोड़े दिन की मज़बूरी है |

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुन्ह अखंड बनायेंगे,
गिलगित से गारो पर्वत तक आज़ादी का पर्व मनाएंगे |
उस स्वणिर्म दिन के लिए आज से कमर कसे बलिदान करे,
जो पाया उसमे खो ना जाये जो खोया उसका ध्यान करे || 
जो पाया उसमे खो ना जाये जो खोया उसका ध्यान करे || 



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Note : The image of Sh Atalbihari has been taken from indiatoday.intoday.in

Sunday, July 21, 2013

आज मैने सूर्य से बस जरा सा यूँ कहा...... "श्री बालकवि जी "बैरागी""

The word Octastich means Poem or Stanza of 8 lines. 

Here are two of my favourites from Poet Shri Balkavi ji "Bairagi". The small poems are really thought provoking. The poet Shri Balkavi ji "Bairagi" is also author of many books and quite of hindi songs. Also served as Member of legislative assembly and upper house of Parliament of India. 

आज मैने सूर्य से बस जरा सा यूँ कहा....


आज मैने सूर्य से बस जरा सा यूँ कहा....आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यूँ रहा ...

तमतमा कर वो दहाड़ा मैं अकेला क्या करूँ...  तुम निकम्मों के लिए मैं भला कब तक मरुँ....

आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो...संग्राम ये घनघोर है कुछ में लडूं कुछ तुम लड़ो !!!!


जब सूरज हो मरा मरा , जब डरा हुआ हो उजियारा... 


जब सूरज हो मरा मरा , जब डरा हुआ हो उजियारा... 

चैतन्य न हो जब चिंगारी , जब बुझा हुआ हो अंगारा... 


तब समझो की षड़यंत्र कहीं, कुछ चलता घने अंधरे का... 


किंचित 'मावस घोंट रही , कंठ कहीं नए सवेरे का... 


तब जिन में बल हो साहस हो , वो ही आगे आते हैं... 


बेशक सूरज बन सके न वो , लेकिन मशाल बन जाते हैं !!! 






Note : The image of the sun has been taken from www.wallironart.com.

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